पूंजीवाद सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में

एक ऐसे दौर में जब पूंजीवाद और पूंजीवादियों को गाली देना स्मार्ट राजनीति समझा जाता है, टाटा का नाम मन में ज़िम्मेवारी, सम्मान और गरिमा का भाव जगाता है।

कुछ ही दिन पहले, या सटीक तारीख़ बताएँ तो 5 फरवरी, 2021 को, टि्वटर पर भारत में #BaratRatnaForRatanTata ट्रेंड कर रहा था। आम लोग रतन टाटा के लिए भारत रत्न की माँग का समर्थन कर रहे थे।

यह समर्थन जारी रहा और यहाँ तक कि 28 फरवरी, 2021 तक भी इसकी चर्चा की जा रही थी और लोगों का समर्थन जारी था।

इतना कि रतन टाटा को स्वयं सामने आकर टिप्पणी करनी पड़ी।

हम एक ऐसे दौर में रह रहे हैं जब पूँजीपतियों के उपनाम गाली और बेईमानी तथा मुनाफाखोरी के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जाते हैं।

यह अविश्वसनीय प्रतीत होता है कि ऐसे दौर में भी आम लोग पूंजीवाद के किसी पुरोधा को सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार देने के लिए सार्वजनिक रूप से समर्थन दे सकते हैं।

इस दर्जे का सम्मान और आदर तभी संभव है जब आप टाटा गुणवत्ता वाले मूल्यों को निरूपित करते और जीते हों।

और इसकी एक ख़ास वजह है।

जब आप देखते हैं कि एक रतन टाटा रिटायरमेंट के बाद किसी एक मशहूर माओवादी अरुंधति रॉय की तुलना में ज़्यादा साधारण और कम सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं, तो आप समझ जाते हैं कि आप पूंजीवाद के उस सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को देख रहे हैं, जो मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद-पोलिपोटिज्म के पक्षकारों की गालियों और नारों को अनदेखा करते हुए समावेशी समृद्धि लाने में जुटा हुआ है। बेईमान और झूठे साम्यवाद, जिसका लक्ष्य ही है सबको निरंतर और एकसमान त्रासदी बाँटना, से बिल्कुल अलग।

रतन टाटा के 65% से अधिक शेयरों का निवेश चैरिटेबल ट्रस्ट में किया गया है।

टाटा नाम वाले ट्रस्ट की कुल संख्या शायद असली माओवादी और लेनिनवादी दलों और चर्चा समूहों की संख्या से भी ज़्यादा हो।

टाटा ट्रस्ट और जेएन टाटा एंडोमेंट से लेकर सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट व सर रतन टाटा ट्रस्ट से लेकर लेडी टाटा मेमोरियल ट्रस्ट तक जैसी संस्थाओं ने न केवल राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया है, बल्कि कुछ बेहतरीन संगठन और संस्थाएँ भी तैयार किये हैं, जिनमें मुख्य हैं भारतीय विज्ञान संस्थान और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च।

टाटा समूह ने भारतीयों का जीवन बेहतर बनाया है। कितना, यह जानने के लिए आपको बस टाटा अस्पताल में कैंसर से बचाये गये किसी बच्चे से बात करनी होगी।

टाटा नाम ने हमें किसी न किसी रूप में स्पर्श किया है।

और यह सब इसलिए हुआ क्योंकि एक व्यापारी जे एन टाटा ने अपने उपक्रम और उद्योग के माध्यम से इस दुनिया पर अपनी छाप छोड़ने का फैसला किया।

वह छाप कैसी है और उस उद्यम और परोपकारी पूंजीवाद का असर कितना दूरगामी है, इसे जमशेदपुर में रहने वाले किसी व्यक्ति से ज़्यादा कोई और नहीं महसूस कर सकता।

जिम्मेदार कॉर्पोरेट संस्कृति और व्यवहार ने टाटा को पूंजीवाद का सबसे अच्छा प्रवर्तक बना दिया है।

विंस्टन चर्चिल सही थे, जब उन्होंने कहा था, “पूंजीवाद का अंतर्निहित दोष है कल्याण का असमान वितरण; समाजवाद का अंतर्निहित गुण है त्रासदी का एकसमान वितरण। “

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