भारत की विजयी वैक्सीन-मैत्री पहलकदमी

भारत की वैक्सीन मैत्री पहलकदमी की पूरी दुनिया में प्रशंसा हो रही है और आने वाले दिनों में देश के लिए अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना पैदा करने में यह काफ़ी उपयोगी साबित होगी.

यह एक अच्छी बात है कि दुनिया के अधिकांश देशों ने कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई में सकारात्मक भूमिका के लिए भारत की प्रशंसा की है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारियों ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि दुनिया को महामारी के खिलाफ इस लड़ाई को जीतने के लिए भारत के वैक्सीन निर्माण के बुनियादी ढांचे की मदद लेनी होगी. वहीं कई छोटे देशों ने वैक्सीन की आपूर्ति के लिए भारत की सराहना की है.

इतिहास में बहुत कम ऐसे मौक़े आये होंगे, जब भारत की किसी विदेश नीति से संबंधित पहलकदमी को इतनी व्यापक सराहना मिली हो। आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय मामलों की दुनिया स्वार्थपरक नज़रिए और आत्महित पोषण पर आधारित होती है. लेकिन ‘वसुधैव कुटुम्बकम् ’और ‘सर्वे संतु निरामया’ जैसे पुराने मंत्रों पर आधारित भारत के नीतिगत उपाय सफल साबित हो रहे हैं, क्योंकि ये स्व-हित में और नग्न मुनाफाखोरी पर आधारित नहीं हैं.

ध्यान देने योग्य बात यह है कि भारत की विदेश नीति को पिछले कुछ वर्षों के दौरान मजबूत गति और स्पष्ट दिशा मिली है.

देश में वैसे आलोचकों की कोई कमी नहीं है, जो यह बताना चाहेंगे कि देश में हर किसी को अभी तक टीका नहीं लगाया गया है और बेहतर यह होगा कि अन्य देशों को टीके भेजने से पहले अपने नागरिकों पर ध्यान दिया जाए।

एक संकीर्ण दृष्टिकोण देश के दीर्घकालिक हित में नहीं है. सच्चाई यह है कि अंतरराष्ट्रीय महामारी के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी पहल करने का भारत का निर्णय एक से अधिक तरीकों से सफल साबित हुआ है। इसने देश को अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में कद हासिल करने में मदद की है और इसे अपनी दवा और वैक्सीन निर्माण क्षमता को साबित करने का अवसर दिया है. चीन की महत्वाकांक्षा थी कि वह विश्व-रक्षक की भूमिका निभाये. उसके पास सारे आवश्यक अवयव थे, एक विशाल विनिर्माण आधार और धन. साथ ही, दुनिया के मामलों पर हावी होने का लक्ष्य. फिर भी, भारत ने पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में मानने और सभी के लिए अच्छे स्वास्थ्य की कामना के अपने सरल और पुराने मंत्रों का पालन करते हुए चीन को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है.

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