पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की त्रासद स्थिति

एक लंबे अरसे से, सच कहें तो पाकिस्तान बनने के दिन से ही, पूरे विश्व ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों, जैसे कि हिंदुओं, ईसाइयों, सिखों, हजारा तथा अहमदिया समुदाय पर होनेवाले अत्याचारों की ओर आंखें मूंद रखी हैं। यह सचमुच काफ़ी त्रासदीपूर्ण तथ्य है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ सरकारों के संरक्षण के साथ और राज्य-स्वीकृत क़ानून के बल पर अत्याचार किये जाते हैं। राज्य-स्वीकृत हिंसा का प्रमाण होने के बावजूद, दुनिया ने पाकिस्तानी समाज की जमीनी वास्तविकताओं पर कोई ध्यान नहीं दिया है।

हिंदू तो वैसे किसी भी देश के लिए ज्यादा मायने नहीं रखते। इसलिए क्योंकि वे बड़े पैमाने पर वोट बैंक के रूप में व्यवहार नहीं करते हैं और इसलिए भी कि वे बहुत मुखर और संगठित समुदाय नहीं हैं। हिंदू अपने वर्तमान में ही तल्लीन रहते हैं और वे आम तौर पर अपनी परिस्थितियों के बीच रहकर घटित होनेवाले वाकयों को प्रारब्ध मानकर स्वीकार कर लेते हैं।

पाकिस्तानी हिंदुओं के लिए अपनी समस्याओं और भय और क्रूरता के माहौल के बारे में पूरी दुनिया को बता पाना उतना आसान नहीं होगा।

एक अच्छी बात यह है कि पाकिस्तानी सुन्नी बहुल समाज अन्य धार्मिक समुदायों के साथ भी उतनी ही बर्बरता से पेश आता है, जितनी कि हजारा समुदाय के साथ या फिर ईसाई समुदाय के साथ। सच तो यह है कि ईसाई अल्पसंख्यक के खिलाफ होनेवाले अत्याचारों एवं क्रूरताओं ने ही गाहे-बगाहे पश्चिमी मीडिया का ध्यान पाकिस्तान की त्रासदीपूर्ण धार्मिक और सामाजिक स्थिति की ओर आकर्षित किया है।

अल्पसंख्यक धर्मों की नाबालिग लड़कियों का अपहरण और अपहरणकर्ताओं के साथ करायी जानेवाली जबरिया शादियाँ पाकिस्तान के लिए आम बात हैं। इस सामाजिक क्रूरता को रोकने के कुछ भी नहीं किया गया है। अब तक हजारों हिंदू, सिख और ईसाई नाबालिग और बालिग़ लड़कियों और महिलाओं का अपहरण किया जा चुका है, उनका धर्म परिवर्तित कर दिया गया है और उनकी शादी अपहरणकर्ताओं से करा दी गयी है, प्रशासन और सरकार के सहयोग से और कई मामलों में तो न्यायालय के संरक्षण और आदेश के साथ।

शायद ही कोई मामला हो जहां कानून के तहत ऐसे अपराध के दोषियों को दंडित किया गया हो।

तथ्य यह है कि दुनिया मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ होनेवाले ऐसे किसी भी अपराध को एक अपेक्षित सामान्य वाक़या समझती है, जिसे आसानी से अनदेखा कर दिया जाता है।

दुनिया ने 1971 में बांग्लादेश में पाकिस्तानी सेना द्वारा हिंदू समुदाय पर किये गये अत्याचारों को भी अनदेखा कर दिया था। दुनिया इस तथ्य से भी बेखबर है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को लगभग समाप्त कर दिया गया है।

दरअसल यह कुछ ही दशकों में अल्पसंख्यक समुदाय की पूरी आबादी के नियोजित ढंग से उन्मूलन का सबसे सनसनीख़ेज़ मामला है। पाकिस्तान में 1947 की और आज अल्पसंख्यकों की आबादी की तुलना की जानी चाहिए। आँकड़े अपनी कहानी स्वयं बोलेंगे।

यह सच है कि समय के साथ दुनिया आगे बढ़ी है और मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा के मानकों में समय के साथ वृद्धि हुई है। हालाँकि, जब इस्लामी देशों में मानवाधिकारों और सम्मान के समान मानकों को लागू करने की बात आती है, तो दुनिया बुरी तरह से विफल हो जाती है।

इस्लामिक देशों में धर्म के ख़िलाफ़ बोलने पर सर कलम करने, पत्थर से मारकर सरेआम हत्या करने आदि परंपराएँ आज भी आम हैं।

दुनिया ने कभी भी ऐसे देशों के लिए अपने प्रगतिशील मानकों को लागू करने की आवश्यकता महसूस नहीं की है।

अगर दुनिया के सभी देशों में बुनियादी मानवाधिकारों को लागू करने में वैसी ईमानदारी दिखाई जाती जैसा कि भारत में आंदोलनकारी किसानों के लिए, या फिर कश्मीर के लिए, निर्बाध इंटरनेट के अधिकार का समर्थन करने में दिखाया गया है, तो दुनिया में चीजें थोड़ी बेहतर होतीं।

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